84/05 श्री अनादिकल्पेश्वर महादेव : सृष्टि के अनादि स्रोत, जहाँ से ब्रह्मांड का आरंभ हुआ

अनादि काल से विराजमान परम तत्व
सनातन धर्म के पावन ग्रंथों में श्री अनादिकल्पेश्वर महादेव का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिव पुराण में स्वयं भगवान रुद्र माता पार्वती को इस दिव्य शिवलिंग की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह लिंग कल्प से भी पूर्व प्रकट हुआ था। उस अनादि काल में जब अग्नि, सूर्य, पृथ्वी, दिशाएं, आकाश, वायु, जल, चंद्रमा, देवता, असुर, गंधर्व और पिशाच भी अस्तित्व में नहीं थे, तब भी यह शिवलिंग विद्यमान था। इसी दिव्य लिंग से देवताओं, पितरों और ऋषियों के वंश उत्पन्न हुए। समस्त चर-अचर जगत की उत्पत्ति इसी से हुई है और प्रलयकाल में सब कुछ इसी में विलीन हो जाता है।
ब्रह्मा-विष्णु विवाद और महान सत्य का प्रकटीकरण
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार ब्रह्माजी और भगवान विष्णु में श्रेष्ठता का विवाद उत्पन्न हुआ। तभी आकाशवाणी हुई कि महाकाल वन में कल्पेश्वर नामक दिव्य शिवलिंग विराजमान है। जो इस लिंग का आदि और अंत खोज लेगा, वही सर्वश्रेष्ठ होगा। दोनों देवता अपनी संपूर्ण शक्ति लेकर महाकाल वन पहुंचे। ब्रह्मा ऊपर की ओर गए और विष्णु नीचे की ओर। अथक प्रयासों के बावजूद किसी को भी उस अनंत लिंग का आदि या अंत प्राप्त नहीं हुआ। यही इस शिवलिंग की परम विशेषता है – यह अनादि और अनंत है, जिसका न आरंभ है न अंत।
एक अन्य कथा में ब्रह्माजी को अपनी सृजन शक्ति पर अभिमान हो गया था। उन्हें लगता था कि वे ही समस्त ब्रह्मांड के रचयिता हैं। तब आकाशवाणी ने उन्हें महाकाल वन में कल्पेश्वर शिवलिंग के आदि-अंत की खोज करने को कहा, किंतु वे असफल रहे। इस घटना ने उन्हें विनम्रता का पाठ पढ़ाया और यह स्पष्ट किया कि परमात्मा शिव ही सर्वोच्च सत्ता हैं।
मंदिर की भव्यता और दिव्य स्वरूप
उज्जैन के 84 शिव मंदिरों में गिने जाने वाले श्री अनादिकल्पेश्वर महादेव का मंदिर महाकाल मंदिर परिसर के दक्षिण-पश्चिम कोने में स्थित है। यह भव्यता में महाकाल मंदिर के बाद दूसरे स्थान पर आता है। लगभग 100 वर्ग फीट के गर्भगृह में डेढ़ फीट ऊंचा प्राचीन लाल-भूरे रंग का शिवलिंग स्थापित है। 6 फीट की जलाधारी और पास में 6 फीट ऊंचा दर्शनीय त्रिशूल, जिस पर गणेश जी और माता पार्वती की आकृतियां उत्कीर्ण हैं, मंदिर की दिव्यता को और बढ़ाते हैं। शिवलिंग को 3 फीट ऊंचे पंचमुखी सर्प ने आच्छादित किया हुआ है। गर्भगृह के समक्ष 6 फीट ऊंचे आसन पर नंदी महाराज की प्राचीन प्रतिमा विराजमान है।
आध्यात्मिक शिक्षा और महत्व
शिव पुराण में महादेव कहते हैं कि जो श्रद्धालु इस शिवलिंग के दर्शन करता है, वह धन्य है और उसे राजसूय यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है। यह शिवलिंग हमें सिखाता है कि परमात्मा अनादि और अनंत हैं। अहंकार कितना भी बड़ा क्यों न हो, ईश्वर की महिमा के समक्ष नगण्य है। आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश मिलता है कि विनम्रता, समर्पण और भक्ति ही जीवन का सार है। महाकाल दर्शन को आने वाले श्रद्धालु यहां दर्शन कर अपने जीवन को धन्य करते हैं और शाश्वत सत्य का अनुभव करते हैं।
